वर्णन : यह वात पित कफ तीनो दोषो का समन करता हें कामोत्तेजक हैं कामोतेजना पैदा करता हैं
पेट को साफ़ करता हैं और ये सूजन को दूर करता हैं
बवासीर और सुजक के रोगियों में विशेष फायदा करता हैं और शरीर में रोग से लड़ने की ताकत पैदा करता हैं और शुगर रोग को नष्ट करता हैं
और इसके कच्चे पत्तो को स्वराश दही में घोंट कर पिलाया जाये तो पीलिये में विशेष लाभ करता हैं
जो मानसिक ताकत देता हैं और मांसपेशियों को मजबूत करता हैं
कमर और घुटनो के दर्द में इसको विशेष लाभदायी देखा गया हैं
बला के पत्तों का प्रयोग करने से इन्सुलिन बनता हैं और शरीर में एंटीबायोटिक प्रभाव देता हैं
बलारिष्ट का प्रयोग करने से घोड़े जैसी फुर्ती बानी रहती हैं
घटक : बला, असगंध, गुड़, धाय के फूल, क्षीरकाकोली, एरण्डमूल, रासना, बड़ी इलायची, प्रसारनी, लौंग, उशीर, गोकरु-बीज
उपयोग – यह औषध उत्तम वातनाशक, पुष्टिकारक, बलवर्द्धक और जटराग्नि प्रदीपद है। इसके सेवन से समस्त प्रकार के कठिन से कठिन वातव्याधि रोग नष्ट होते हैं। खांसी, श्वास, राजयक्ष्मा प्रमेह और बालक्षय में भी लाभकारी है। ये स्नायुमण्डल को भी पुष्ट करता है।
उपयोग मात्रा: 4 चम्मच दवा, 8 चम्मच पानी, सुबह शाम भोजन के तुरन्त आधे घंटे बाद लेना चाहिए।
इसका प्रयोग चिकित्सक के परामर्श से करें



























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